लद्दाख का 20 हजार मेगावाट सोलर प्रोजेक्ट हिमालय रीजन को करेगा तबाह: नाथू राम चौहान
बोले—विशाल ट्रांसमिशन लाइन से हजारों किसान हो सकते हैं भूमिहीन, हिमालय इतना बोझ सहन नहीं कर पाएगा
समाजसेवी एवं पर्यावरणविद् नाथू राम चौहान ने लद्दाख में प्रस्तावित 20 हजार मेगावाट के सोलर पावर प्रोजेक्ट को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि लद्दाख से हरियाणा-राजस्थान तक बिजली पहुंचाने के लिए प्रस्तावित विशाल ट्रांसमिशन लाइन और हिमालयी क्षेत्र में चल रही व प्रस्तावित बड़ी परियोजनाओं का संयुक्त दबाव हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
कुल्लू में प्रेस को संबोधित करते हुए नाथू राम चौहान ने कहा कि कीरतपुर-मंडी-मनाली से लद्दाख तक का ऐतिहासिक गलियारा पहले ही लगातार प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहा है। ऐसे में इस क्षेत्र की वहन क्षमता (Carrying Capacity) को ध्यान में रखे बिना बड़े पैमाने पर परियोजनाएं स्थापित करना उचित नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि लद्दाख के पांग क्षेत्र की ऊंचाइयों में 20 हजार मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन और वहां से करीब 900 मील दूर हरियाणा-राजस्थान के कैथल ग्रिड तक बिजली की निकासी के लिए विशाल ट्रांसमिशन लाइन प्रस्तावित है। इसके अलावा रोहतांग क्षेत्र के समीप, शिगरी ग्लेशियर के मुहाने के पास चंद्रा नदी को करीब 8.9 किलोमीटर लंबी सुरंग के माध्यम से कुल्लू-मंडी घाटी की ओर बहने वाली ब्यास नदी में मोड़ने जैसी परियोजनाओं को लेकर भी उन्होंने चिंता व्यक्त की।
नाथू राम चौहान ने कहा कि हिमालय क्षेत्र में विकास जरूरी है, लेकिन विकास की योजनाएं स्थानीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और क्षेत्र की प्राकृतिक वहन क्षमता को ध्यान में रखकर ही बनाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि वह बिलासपुर-मनाली-लद्दाख प्रस्तावित रेल लाइन तथा सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बॉर्डर रोड्स के चौड़ीकरण और उच्चीकरण का समर्थन करते रहे हैं, लेकिन मैदानी क्षेत्रों की जरूरतों के लिए हिमालयी क्षेत्र में ऐसी भारी-भरकम बिजली परियोजनाओं का निर्माण, जिनका नुकसान स्थानीय लोगों को उठाना पड़े, उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बांधों, सुरंगों और ट्रांसमिशन लाइनों के बढ़ते दबाव का व्यापक पर्यावरणीय अध्ययन किया जाना चाहिए। उनके अनुसार हिमालय पहले ही भूस्खलन, बाढ़, बादल फटने और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहा है। ऐसे में नए प्रोजेक्ट स्वीकृत करने से पहले क्षेत्र की Carrying Capacity का वैज्ञानिक आकलन बेहद जरूरी है।
चौहान ने जल संसाधनों के बेहतर उपयोग की वकालत करते हुए कहा कि भारत के हिस्से की सतलुज, रावी और ब्यास नदियों के पानी का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने की दिशा में भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पहले से मौजूद नहर प्रणालियों के माध्यम से राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था को और मजबूत किया जा सकता है।
उन्होंने वैकल्पिक सौर ऊर्जा मॉडल का सुझाव देते हुए कहा कि हिमालयी शीत मरुस्थलों से सैकड़ों मील दूर मैदानी क्षेत्रों तक बिजली पहुंचाने के लिए विशाल ट्रांसमिशन नेटवर्क खड़ा करने के बजाय मैदानी क्षेत्रों में पहले से बनी नहरों के ऊपर सोलर पैनल लगाए जा सकते हैं। इससे कम लागत में बिजली उत्पादन के साथ भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय नुकसान को भी कम किया जा सकता है।
नाथू राम चौहान ने कहा कि हिमालय केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि देश के जल, पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए यहां किसी भी बड़ी परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले उसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का निष्पक्ष आकलन किया जाना चाहिए।

