ऑनलाइन न्यूज नेटवर्क (ONN)
हिमाचल प्रदेश में चार पावर प्रोजेक्ट स्थापित हो रहे हैं. ये परियोजनाएं केंद्र सरकार के अधीन स्थापित की जा रही हैं. अब ये परियोजनाएं हिमाचल की होंगी. हिमाचल प्रदेश सरकार ने इस मामले में पावर प्रोजेक्ट्स को अपने अधीन लाने की प्रक्रिया तेज कर दी है. प्रोजेक्ट्स को अपने अधीन लेने के लिए जारी प्रक्रिया की जानकारी हिमाचल सरकार ने हाईकोर्ट के समक्ष दी है.
राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के समक्ष बताया है कि चार परियोजनाओं में 210 मैगावाट क्षमता की लुहरी स्टेज वन, 66 मैगावाट क्षमता का धौलासिद्ध पावर प्रोजेक्ट, 382 मैगावाट क्षमता की सुन्नी बांध परियोजना और 500 मैगावाट की डुगर हाइड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना को अपने अधीन लाने के लिए इन सभी कंपनियों से महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी गई हैं.
राज्य सरकार ने अदालत के समक्ष कहा है कि इन कंपनियों से सारी जानकारी ली जा रही है, ताकि उन्हें लागत मूल्यों को लौटाया जा सके. सरकार ने एनएचपीसी यानी नेशनल हाइड्रो पावर कारपोरेशन और एसजेवीएनल यानी सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड को पत्र लिखकर संबंधित परियोजनों से जुड़ी लेखा परीक्षा बैलेंस शीट (वर्षवार), पूंजीगत कार्यों के विवरण सहित, परियोजनाओं की निर्माण प्रगति पर कार्य और अचल संपत्तियों की अनुसूची प्रदान करने को कहा है.
राज्य सरकार ने कहा है कि इन कंपनियों को खर्च की गई रकम का हर मद का ब्यौरा देना होगा. इस ब्यौरे में सिविल वर्क, निर्माण एवं रखरखाव, भूमि अधिग्रहण, स्थापना सहित इन परियोजनाओं से संबंधित लोन और बैंक लोन आदि का विवरण शामिल है. राज्य सरकार ने कंपनियों की तरफ से बैंकों को प्रस्तुत मूल्यांकन नोट की प्रति भी मांगी है.
यहां बता दें कि नेशनल हाइड्रो पावर कारपोरेशन व सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड ने उक्त चार परियोजनाओं को हिमाचल प्रदेश सरकार के अधीन करने के एवज में निर्माण पर खर्च की गई रकम के साथ-साथ 15 प्रतिशत की दर से पर्यवेक्षण शुल्क की मांग भी की है. हाईकोर्ट में न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर व न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ मामले की सुनवाई कर रही है. इन परियोजनाओं की कंपनियों की ओर से न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर की अगुवाई वाली खंडपीठ को बताया गया कि वह राज्य सरकार को जल्द सारी जानकारियां दस्तावेजों सहित प्रदान कर देंगे, ताकि उचित निर्णय लिया जा सके.
उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने पावर कंपनियों से नए सिरे से एग्रीमेंट के लिए कहा है. मामला हाईकोर्ट में गया तो अदालत से पावर प्रोजेक्ट्स चलाने वाली कंपनियों को प्रोटेक्शन मिली है कि राज्य सरकार उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगी. साथ ही ये भी तय हुआ कि यदि राज्य सरकार परियोजनाओं को वापस लेना चाहती है तो तय खर्च कंपनियों को देने की क्या प्रक्रिया है. इसी प्रक्रिया की जानकारी राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के समक्ष दी है.

