ऑनलाइन न्यूज नेटवर्क (ONN)
हिमाचल प्रदेश में लोकतंत्र की जड़ें फिर से गांव-गांव तक मजबूत होने को तैयार हैं. पंचायतीराज संस्थाओं के चुनावों की आहट तेज हो चुकी है और इसी के साथ सियासी सरगर्मियां भी चरम पर पहुंचने लगी हैं. चुनाव तारीखों के औपचारिक ऐलान से पहले ही संभावित उम्मीदवारों ने सोशल मीडिया को अपना रणक्षेत्र बना लिया है, कहीं विकास के वादे, तो कहीं जनसेवा का संकल्प, हर दावेदार अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में जुटा है.
55 लाख से अधिक मतदाता करेंगे भाग्य का फैसला!
करीब 55 लाख से अधिक मतदाता इस बार हजारों उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे, ऐसे में हर प्रत्याशी की नजर सिर्फ अब चुनाव की तारीखों के ऐलान पर टिकी हैं. ऐसे में जैसे ही राज्य में पंचायतीराज संस्थाओं के लिए चुनाव की घोषणा होती है. प्रदेश में नामांकन भरने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. जिसके बाद चुनावी रण में किस्मत आजमाने वाले उम्मीदवारों को चुनाव चिन्हों का आवंटन किया जाएगा. ऐसे में चुनावी मैदान में उतरने के बाद भी एक दिलचस्प पहलू उम्मीदवारों के बीच चुनाव चिन्ह आवंटित होने को लेकर चर्चा का विषय बना रहता है. बता दें कि, उम्मीदवारों को उनकी पसंद का चुनाव चिन्ह नहीं मिलता. हिमाचल प्रदेश पंचायतीराज इलेक्शन रूल 42 के तहत प्रतीकों का आवंटन अल्फाबेटिक क्रम के आधार पर किया जाता है. यानी किसे कौन-सा चिन्ह मिलेगा, यह व्यक्तिगत पसंद नहीं बल्कि नियमों से तय होता है. यही नियम चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखने की आधारशिला भी हैं.
नाम, सरनेम और फादर नेम का दिलचस्प पहलू
हिमाचल में पंचायत चुनावों में मुकाबला कभी-कभी इतना दिलचस्प हो जाता है कि मतदाता भी सोच में पड़ जाते हैं कि जब एक ही नाम के कई उम्मीदवार मैदान में हों तो आखिर पहचान कैसे हो? दरअसल, पंचायतीराज चुनावों में सिंबल (चुनाव चिह्न) आवंटन के पीछे एक बेहद व्यवस्थित लेकिन रोचक नियम काम करता है. पहली नजर में यह प्रक्रिया साधारण लग सकती है, लेकिन जैसे ही एक ही नाम वाले उम्मीदवार सामने आते हैं, नियमों की असली परीक्षा शुरू हो जाती है.
मान लीजिए किसी पंचायत में प्रधान पद के लिए ‘अमन’ नाम के दो या तीन उम्मीदवार खड़े हैं. अब चुनाव आयोग सीधे-सीधे नाम के आधार पर सिंबल नहीं दे सकता. ऐसे में अगला आधार बनता है सरनेम, यानि उपनाम, जिनका सरनेम अल्फाबेटिक क्रम में पहले आएगा, उसे उसी हिसाब से प्राथमिकता मिलेगी. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. अगर उम्मीदवारों का नाम और सरनेम दोनों ही एक जैसे निकल आएं, तो फिर बारी आती है ‘फादर नेम’ की. पिता के नाम के अल्फाबेटिक क्रम से तय होता है कि किसे कौन सा चुनाव चिन्ह मिलेगा. ऐसे में पंचायत चुनाव सिर्फ वोटों की लड़ाई नहीं, बल्कि नामों के अल्फाबेट की दिलचस्प जंग भी बन जाते हैं. जहां ‘अमन’ से शुरू हुई कहानी कभी पिता के नाम तक पहुंचकर ही सुलझती है.
हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों की तस्वीर बाकी चुनावों से बिल्कुल अलग होती है. यहां न तो किसी राजनीतिक दल का झंडा लहराता है और न ही उम्मीदवार किसी पार्टी चिन्ह के सहारे मैदान में उतरते हैं. गांव की गलियों में मुकाबला पूरी तरह व्यक्तिगत पहचान, काम और भरोसे पर टिका होता है. ऐसे में चुनाव चिन्ह को लेकर सबसे दिलचस्प पहलू बन जाता है. जो मतदाताओं के लिए उम्मीदवार को पहचानने का मुख्य जरिया होता है. चूंकि ये चुनाव गैर-दलीय आधार पर होते हैं, इसलिए हर प्रत्याशी को अलग पहचान देने की राज्य निर्वाचन आयोग जिम्मेदारी को उठाता है.
हिमाचल प्रदेश पंचायती राज इलेक्शन रूल 34 के तहत आयोग समय-समय पर सिंबल की अधिसूचना जारी करता है. इसी के आधार पर चुनाव मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों को उनके चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाते हैं. यही चुनाव चिन्ह गांव-गांव में प्रचार का चेहरा बनते हैं और मतदाताओं के फैसले में अहम भूमिका निभाते हैं.
हर पद के लिए 20 चुनाव चिन्ह तय
हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव भले ही बिना पार्टी चिन्ह के होते हों, लेकिन ये चुनाव काफी दिलचस्प होते हैं. उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या और कड़ी प्रतिस्पर्धा को देखते हुए राज्य निर्वाचन आयोग ने खास तैयारी की है. अब हर पद के लिए अलग-अलग चुनाव चिन्ह तय किए गए हैं, ताकि मतदाता भी आसानी से अपनी पसंद पहचान सकें और उम्मीदवारों को भी स्पष्ट पहचान मिल सके. राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत चुनावों के लिए कुल 100 चुनाव चिन्हों की अधिसूचना जारी की है. ये चिन्ह पांच अलग-अलग पदों जैसे पंचायत वार्ड सदस्य, उप प्रधान, प्रधान, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य के लिए निर्धारित किए गए हैं, जहां हर पद के लिए 20-20 चिन्ह तय किए गए हैं. खास बात यह है कि यदि किसी पद पर उम्मीदवारों की संख्या तय चिन्हों से अधिक हो जाती है, तो आयोग ने अतिरिक्त चुनाव चिन्हों की व्यवस्था भी रखी है. वहीं, उम्मीदवारों को चुनाव चिन्हों का आवंटन अल्फाबेटिकल क्रम के आधार पर किया जाएगा, जिससे प्रक्रिया पारदर्शी और सुव्यवस्थित बनी रहे.
हिमाचल में हर एक पद के लिए एक समान चुनाव चिन्ह
हिमाचल प्रदेश में पंचायतीराज चुनावों को लेकर एकरूपता और पारदर्शिता पर खास जोर दिया जाता है. प्रदेश की सभी 3758 पंचायतों में विभिन्न पदों के लिए चुनाव चिन्ह पहले से निर्धारित और एक समान होंगे, जिससे मतदाताओं और प्रत्याशियों के बीच किसी भी तरह की भ्रम की स्थिति न रहे. खास बात यह है कि प्रधान पद के लिए अधिसूचित 20 चुनाव चिन्ह जैसे हाथ की घड़ी, धनुष-बाण, गैस का चूल्हा, गाजर, जग, समुद्री जहाज, रेल का इंजन, नारियल का पेड़, टेबल लैंप, ट्रक, पुल, कंघी, किला, गोंद की बोतल, हारमोनियम, दीवार घड़ी, रोड रोलर, ईंट, लिफाफा और अंगूर पूरे प्रदेश में अल्फाबेटिकल क्रम के आधार पर आवंटित किए जाएंगे. यही व्यवस्था वार्ड सदस्य, उपप्रधान, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य पदों के चुनाव में भी लागू होगी, जिससे चुनाव प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और निष्पक्ष बन सके.
हर बार बदलते हैं सिंबल
हिमाचल प्रदेश में पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव सिर्फ लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि पारदर्शिता की एक अनोखी मिसाल भी पेश करते हैं. यहां चुनाव बैलेट पेपर के जरिए कराए जाते हैं, और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए हर पांच साल में चुनाव चिन्हों के क्रम को बदलने की व्यवस्था लागू है. इसका सीधा असर यह होता है कि कहीं पर पिछले चुनाव के बैलेट पेपर का प्रयोग न हो और मतदाता किसी एक स्थायी क्रम या चिन्ह से प्रभावित न हों और चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से संपन्न हो. उदाहरण के तौर पर, यदि पिछले चुनाव में प्रधान पद के लिए बैलेट पेपर में पहले स्थान पर ‘मेज’ चुनाव चिन्ह था, तो इस बार उसी स्थान पर ‘अंगूर’ या कोई अन्य चिन्ह दिखाई दे सकता है. यही व्यवस्था पंचायत के वार्ड सदस्य से लेकर जिला परिषद सदस्य तक सभी पदों के लिए लागू होती है, जिससे हर स्तर पर पारदर्शिता और निष्पक्षता को मजबूती मिलती है.
हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था का इतिहास आज़ादी के शुरुआती वर्षों से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसकी मौजूदा संरचना तक पहुंचने का सफर कई अहम संवैधानिक और प्रशासनिक बदलावों से होकर गुज़रा है. शुरुआत में, हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1952 के तहत वर्ष 1954 में प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं को वैधानिक रूप से स्थापित किया गया था. उस समय राज्य में केवल 280 ग्राम पंचायतें अस्तित्व में थीं. पंचायतों का दायरा सीमित था और चुनावी प्रक्रिया भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं मानी जाती थी. उस दौर में लोकसभा से लेकर स्थानीय निकायों तक के चुनावों का जिम्मा चुनाव विभाग के पास ही होता था. लेकिन लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक मजबूत करने के उद्देश्य से बड़ा बदलाव तब आया, जब 73वां संविधान संशोधन लागू किया गया.
पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा
इस संशोधन ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया और स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए अलग से राज्य निर्वाचन आयोग के गठन का प्रावधान किया. इसी कड़ी में सभी राज्यों को अपना-अपना पंचायती राज कानून बनाने का निर्देश दिया गया. पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1994 लागू किया, जिसने प्रदेश में स्थानीय स्वशासन की नई नींव रखी. इस नए कानून के तहत गठित राज्य निर्वाचन आयोग ने वर्ष 1995 में पहली बार स्थानीय निकायों के चुनाव स्वतंत्र रूप से संपन्न कराए.

