ऑनलाइन न्यूज नेटवर्क (ONN)
मजदूर नेता प्रदीप चौहान पिछले 11दिनों में तीन बार सिविल अस्पताल पहुंचे, जहाँ दक्षिण एशिया महाद्वीप के प्रख्यात पर्यावरणविद्ध, समाजसेवी और दिल्ली में भीषण सड़क हादसे का शिकार हुए नाथूराम चौहान से मिलने बराबर हॉस्पिटल आये।
प्रदीप चौहान ने कहा कि शहर पोंटा साहिब ही नहीं सिरमौर हिमाचल प्रदेश सहित सभी जगह से बड़े-बड़े लोग बड़े उद्योगपति समाजसेवी व बड़े राजनीतिज्ञ लगातार नाथूराम चौहान से मिलने हॉस्पिटल आ रहे हैं। लेकिन यहां पर जो बात मुझे गलत लगी वह यह थी कि इन 10-11 दिनों में स्थानीय प्रशासन की ओर से किसी भी व्यक्ति ने अस्पताल में आकर इतने बड़े समाजसेवी व पर्यावरणविद्ध की सुध लेना उचित नहीं समझा।
साथ ही साथ बड़े लोग तो आए हैं पर जिन पिछड़े दबे कुचले असहाय समाज से हासिये पर धकेल गए लोगों के लिए नाथूराम चौहान पिछले 15 साल से बराबर लड़ाई लड़ रहे हैं वह लोग जिनके लिए नाथूराम चौहान ने एक-एक महीने का अनशन धरना प्रदर्शन व सरकार से टकराने का काम किया है ऐसे लोग जिनको नाथूराम चौहान मुख्य धारा में जोड़ना चाहते थे आगे बढ़ना चाहते थे या जिनके लिए इन्होंने लड़ाइयां लड़ी वह व्यक्ति या वह लोग न तो हॉस्पिटल में दिखे और न ही उनकी सुरक्षा की आवाज उठाने आये।
हैरानी की बात तो यह भी है कि जो नाथूराम चौहान पिछले 15 सालों से पूरे हिमालय क्षेत्र के लिए या यू कहे की दक्षिण एशिया महाद्वीप के लोगों की सांसों की लड़ाई लड़ रहे हैं, इस समय सुनियोजित तरीके से नाथूराम चौहान की ही सांसों को बंद करने का प्रयास कर रहे है। ऐसे में सवाल तो बनता है जो व्यक्ति सड़क से लेकर और सर्वोच्च न्यायालय तक जल्द जंगल, जमीन, जीव-जंतु जीवन और आम आदमी की लड़ाई लड़ रहा हो और उसमें सफल भी हुआ हो ऐसे व्यक्ति की सुरक्षा हेतु न तो प्रशासन गंभीर दिख रहा है और न वह लोग जिनके लिए नाथूराम चौहान ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
प्रदीप चौहान का कहना है कि मैं उन सभी लोगों से निवेदन करता हूं और प्रशासन से निवेदन करता हूं कि ऐसी घोर लापरवाही क्यों… इतने महान समाज सेवी पर्यावरणविद्ध जिनकी वजह से हमारा नाम प्रदेश देश ही नहीं पूरे एशिया महाद्वीप में गूँजता हो क्या प्रशासन 11 दिनों में 11 मिनट का समय चौहान के लिए नहीं निकल पाया.., और मैं लोगों से भी कहना चाहूंगा कि जब भी हमें जहां भी जरुरत हुई नाथूराम चौहान हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर धरना प्रदर्शन करने, आंदोलन करने, सरकार से टकराने, हम सबका जोखिम खुद पर लेने के लिए जब तैयार थे तो क्या आज हम अंधे गूंगे या बहरे हो गए। क्या आज हमारा नैतिक कर्तव्य नहीं बनता है कि जिस तरह से हर परिस्थिति में नाथूराम चौहान हमारे साथ खड़े रहे आज हम भी इस तरीके से हर स्थिति हर परिस्थिति मे नाथूराम चौहान जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे।
मैं सरकार व प्रशासन को यह भी याद दिलाना चाहूंगा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय अधिकरण की प्रधान पीठ के द्वारा जब भी सिरमौर हिमाचल या हिमालय क्षेत्र में संयुक्त निरीक्षण कमेटी बनी या बनती है उसमें ओरिजिनल एप्लीकेंट होने के नाते नाथूराम चौहान जी की बिना यह कमेटी या फंक्शन नहीं कर सकती है या मूव नहीं कर सकती है। तो क्या सरकार या प्रशासन में इनकी रक्षा या सुरक्षा हेतु किसी तरह की कोई व्यवस्था क्या की थी। सवाल बहुत जवाब एक क्या जितने सजग नाथूराम चौहान जी अपने वह लोगों के हक अधिकार के लिए सजग रहते थे, क्या लोग सरकार या प्रशासन इतना सजग रह पाएगा।
