ऑनलाइन न्यूज नेटवर्क (ONN)
प्रदेश भर में हुए पंचायती राज चुनावों के नतीजों ने जहां कई सियासी दिग्गजों की पारी पर पूर्ण विराम लगा दिया है, वहीं एक ऐसी शख्सियत भी है जिसके लिए हार शब्द मानो शब्दकोश में ही नहीं है। विकास खंड तीसा की ग्राम पंचायत भंजराडू, जहां की जनता ने एक बार फिर कृष्णा महाजन पर भरोसा जताते हुए उन्हें लगातार आठवीं बार प्रधान चुनकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। लोकतंत्र के महापर्व में अक्सर देखा जाता है कि जनता 2 से 3 बार के बाद बदलाव की लहर ढूंढती है, लेकिन भंजराडू पंचायत की तस्वीर कुछ अलग ही बयां करती है। कृष्णा महाजन का अपने क्षेत्र की जनता के साथ ऐसा अटूट रिश्ता है कि यहां कभी बदलाव की राजनीति प्रभावी नहीं हो सकी। सात बार सफलतापूर्वक पंचायत का नेतृत्व करने के बाद अब आठवीं बार उन्हें दोबारा कमान सौंपकर ग्रामीणों ने उनके कार्यों पर अपनी मोहर लगा दी है। कृष्णा महाजन ने अपने प्रतिद्वंद्वी को 724 के भारी अंतर से हराकर प्रदेश भर में इतिहास कायम किया है।
संघर्षों की भट्टी में तपा फौलादी व्यक्तित्व
किसी ने सच कहा है कि मुश्किलें इंसान को या तो तोड़ देती हैं या फिर उसे फौलाद बना देती हैं। चम्बा जिले की भंजराडू पंचायत की 8वीं बार प्रधान बनी कृष्णा महाजन का जीवन इसी फौलादी संकल्प की कहानी है। आज जिस पद और सम्मान पर वे खड़ी हैं, उसकी बुनियाद 1970 के दशक में आए एक ऐसे तूफान के बीच रखी गई थी, जिसने उनके जीवन को पूरी तरह बदल कर रख दिया। कृष्णा महाजन के जीवन में दुखों का पहला पहाड़ 1970 के दशक में टूटा। जब वह अपनी शिक्षा पूरी कर सुनहरे भविष्य के सपने बुन सकती थीं, तभी उनकी माता का आकस्मिक निधन हो गया। घर में सबसे बड़ी होने के नाते, स्नातक कर चुकी इस बेटी के कंधों पर अचानक अपने छोटे भाई और पूरे परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने अपनी खुशियों को किनारे रख, परिवार को बिखरने से बचाया।
पिता को लगा लकवा तो बेटी ने संभाली जिम्मेदारी
कृष्णा महाजन के पिता जो लगातार 5 बार पंचायत की कमान संभाल चुके थे, अचानक 1980 के दशक में पैरालाइज हो गए। पिता की बीमारी ने न केवल घर को आर्थिक और मानसिक रूप से झकझोरा, बल्कि पंचायत की जनता के सामने भी नेतृत्व का संकट खड़ा कर दिया। कृष्णा ने एक समर्पित बेटी की तरह अपने बीमार पिता की सेवा की और घर की चारदीवारी के भीतर से लेकर बाहर तक के हर मोर्चे को संभाला। जब पिता का स्वास्थ्य बिल्कुल खराब हो गया और वह पंचायत का कार्यभार संभालने में असमर्थ हो गए तो उनके सामने एक तरफ बीमार पिता और घर की जिम्मेदारी थी तो दूसरी तरफ पिता की अधूरी छोड़ी जनसेवा की विरासत। कृष्णा ने पीछे हटने के बजाय दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया।
1990 का वो दौर और संघर्षपूर्ण शुरूआत
आज के दौर में महिला प्रधान होना आम बात हो सकती है, लेकिन 1990 के दशक में स्थिति बिल्कुल अलग थी। आज के दौर में पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण और उनकी भागीदारी आम बात लग सकती है, लेकिन कृष्णा महाजन का सफर तब शुरू हुआ जब समाज की संरचना बिल्कुल अलग थी। 1990 के दशक में, जब महिलाओं को सार्वजनिक जीवन और निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में कम ही तवज्जो दी जाती थी, तब कृष्णा ने न केवल प्रधान पद की जिम्मेदारी संभाली, बल्कि पुरुष प्रधान समाज में अपनी योग्यता का लोहा भी मनवाया।
लोकतंत्र में पांच साल का कार्यकाल पूरा करना भी कई बार मुश्किल हो जाता है, लेकिन कृष्णा महाजन ने पिछले 35 सालों से जनता के दिल में जो जगह बनाई है, वह अटूट है। यह उनके काम के प्रति समर्पण का ही नतीजा है कि आज भी लोग उन पर वैसा ही अटूट विश्वास करते हैं, जैसा तीन दशक पहले करते थे। उनकी लोकप्रियता और कार्यशैली का आलम यह है कि उनकी मदद और सलाह केवल भंजराडू पंचायत तक सीमित नहीं रह गई है। तीसा की दूसरी पंचायतों के लोग भी अपनी समस्याएं और फरियाद लेकर उनके पास पहुंचते हैं। चाहे कोई विवाद हो, पारिवारिक मसला हो या सरकारी योजनाओं का लाभ न मिलना, जनता की जायज मांगों के लिए वह शासन के बड़े से बड़े दफ्तर में आवाज उठाने से नहीं हिचकती हैं।

