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Tuesday, April 7, 2026

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हिमाचल की महिलाओं पर ‘साइलेंट किलर’ बीमारी का साया, 70% में कोई लक्षण नहीं

ऑनलाइन न्यूज नेटवर्क (ONN)

विश्व स्वास्थ्य दिवस (WORLD HEALTH DAY) के मौके पर हम आपको देवभूमि हिमाचल प्रदेश से एक डराने वाले आंकड़े बताएंगे. हिमाचल में टाइप-2 डायबिटीज अब केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि एक ‘महा-बीमारी’ का रूप ले चुकी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में किसी बीमारी की व्यापकता (prevalence) 10% से अधिक हो जाए, तो वह महामारी की श्रेणी में आती है. हिमाचल में यह आंकड़ा 14.5% तक पहुंच चुका है.

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस बीमारी ने अब पहाड़ की महिलाओं को अपना सॉफ्ट टारगेट बनाना शुरू कर दिया है. इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) शिमला में हर महीने 30 से ज्यादा ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहां महिलाओं को पता ही नहीं होता कि उन्हें शुगर है, और किसी अन्य सर्जरी या जांच के दौरान यह ‘साइलेंट डिजीज’ अचानक सामने आती है.

2019 में ICMR (भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद) के एक प्रोजेक्ट के तहत पहली बार हिमाचल प्रदेश में डायबिटीज का विस्तृत विश्लेषण किया गया. इस अध्ययन के चेयरमैन डॉ. जितेंद्र कुमार मोक्ता (प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग, IGMC) और को-चेयरमैन डॉ. रमेश थे. इस सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले थे.

श्रेणी भारतीय औसत हिमाचल प्रदेश

डायबिटीज 11% 14.5%

प्री-डायबिटीज 14.5% 17%

असामान्य शुगर लेवल – 29% (लगभग हर तीसरा व्यक्ति)

क्यों बढ़ रहा है महिलाओं में जोखिम?

डॉ. जितेंद्र कुमार मोक्ता बताते हैं कि डायबिटीज को कभी ‘अमीरों की बीमारी’ कहा जाता था, लेकिन आज यह हर घर की चौखट पर खड़ी है. 2008 के आंकड़ों में जहां 85% पुरुष इसकी चपेट में थे, वहीं आज का ट्रेंड बदल गया है. अब 55% महिलाएं इसकी शिकार हो रही हैं.

“साइलेंट डिजीज” का खतरा: डॉ. मोक्ता के अनुसार, हिमाचल की 60 से 70 प्रतिशत महिलाओं में डायबिटीज के कोई लक्षण (Symptoms) दिखाई नहीं देते. कई बार जब महिला किसी गॉल ब्लैडर की सर्जरी या अन्य ऑपरेशन के लिए अस्पताल आती है, तब टेस्ट में पता चलता है कि उसका शुगर लेवल 300 के पार है. इसे ही मेडिकल भाषा में ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है

केस 1: शांति देवी ठियोद की रहने वाली को पिछले कुछ महीनों से थकान रहती थी, जिसे उन्होंने पहाड़ के काम का बोझ समझा. घुटने के दर्द के इलाज के लिए जब वे IGMC आईं, तो रैंडम ब्लड शुगर टेस्ट में उनका लेवल 340 निकला. शांति हैरान थीं क्योंकि उन्हें न तो ज्यादा प्यास लगती थी और न ही बार-बार पेशाब आने जैसी कोई समस्या थी.

महिलाओं में डायबिटीज के इस तरह गुपचुप तरीके से फैलने के पीछे कुछ ऐसे बायोलॉजिकल और सामाजिक कारण हैं, जिन्हें अक्सर हम नजरअंदाज कर देते हैं.

हार्मोनल बदलाव (The Hormonal Rollercoaster): महिलाओं का शरीर जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर भारी हार्मोनल बदलावों से गुजरता है. मेनोपॉज (Menopause): 40-45 की उम्र के बाद जब एस्ट्रोजन हार्मोन का लेवल गिरता है, तो शरीर की इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता कम हो जाती है. इससे अचानक शुगर लेवल बढ़ने लगता है.

PCOS/PCOD: आजकल युवा लड़कियों में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम की समस्या बहुत आम है. इसमें शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता, जो आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज का सबसे बड़ा कारण बनता है.

‘एब्डोमिनल ओबेसिटी’ (पेट का मोटापा): हिमाचली महिलाएं अक्सर शरीर से दुबली दिखती हैं, लेकिन पहाड़ी बनावट और डाइट की वजह से उनमें ‘सेंट्रल ओबेसिटी’ (पेट और कूल्हों के पास चर्बी का जमा होना) ज्यादा देखी जाती है. मेडिकल साइंस के अनुसार, पेट के पास जमा फैट इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा करता है, जिससे अंग ठीक से काम नहीं कर पाते और डायबिटीज ‘साइलेंटली’ पनपने लगती है.

‘जेस्टेशनल डायबिटीज’ का इतिहास: अक्सर गर्भावस्था (Pregnancy) के दौरान महिलाओं की शुगर बढ़ जाती है. बच्चा होने के बाद शुगर नॉर्मल तो हो जाती है, लेकिन डॉ. मोक्ता के अनुसार, ऐसी महिलाओं को भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज होने का खतरा 50% ज्यादा होता है. हिमाचल में कई महिलाएं इस पुराने इतिहास को भूल जाती हैं और बाद में यह बीमारी बनकर लौटता है.

भले ही महिलाएं काम बहुत करती हैं, लेकिन उनके शरीर में ‘लीन मसल मास’ (Lean Muscle Mass) पुरुषों के मुकाबले कम होता है. मांसपेशियां शुगर को जलाने का काम करती हैं. जब फिजिकल एक्टिविटी कम होती है और डाइट में कार्बोहाइड्रेट (चावल/धुएं वाली रोटी) ज्यादा होता है, तो वह शुगर सीधे खून में घुलने लगती है.

बदलते समय के साथ शारीरिक श्रम में कमी आई है. पहले महिलाएं हाथ से कपड़े धोती थीं, मीलों पैदल चलती थीं और खेतों में भारी काम करती थीं. आज हर घर में वाशिंग मशीन है, खेतों में काम करने वाले लोग कम हो गए हैं और नौकरों (servants) पर निर्भरता बढ़ गई है.

परिवहन पर निर्भरता बढ़ी है. पहले बच्चे और बड़े पैदल चलते थे, आज स्कूल बसें और गाड़ियां घर के दरवाजे तक आती हैं. स्क्रीन टाइम अधिक हो गया है. टीवी और मोबाइल ने शारीरिक खेल और चहल-कदमी की जगह ले ली है. तनाव और नींद बहुत बड़ी परेशानी बनकर उभर रही है. आधुनिक जीवन की भागदौड़ में ‘स्ट्रेस’ हर घर का हिस्सा है और नींद की कमी (Lack of sleep) मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ रही है.

‘थिन-फैट इंडियंस’: हम दिखते पतले हैं, पर हैं अनहेल्दी

डॉ. जितेंद्र कुमार मोक्ता कहते हैं, “हिमाचल के लोग देखने में दुबले-पतले लगते हैं, जिससे उन्हें भ्रम होता है कि वे स्वस्थ हैं. लेकिन सर्वे के अनुसार, 45% हिमाचली लोग अंदरूनी रूप से ‘अनहेल्दी’ हैं. पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने के बावजूद हमारा खान-पान हमें बीमार कर रहा है. हिमाचल में 70 से 80% लोग केवल कार्बोहाइड्रेट खा रहे हैं. चावल, परांठे और चपाती हमारे भोजन का मुख्य हिस्सा हैं, जबकि प्रोटीन और फाइबर गायब हैं.”

क्या खाएं और क्या न खाएं?

डॉ. जितेंद्र कुमार मोक्ता के अनुसार, स्वास्थ्य के लिए खाने-पीने में कुछ चीजों का ‘हां’ कहना होगा. हरी सब्जियां (खूब मात्रा में), होल ग्रेन व्हीट (चोकर युक्त आटा), दालें और नट्स (अखरोट, बादाम), सीमित मात्रा में डेयरी प्रोडक्ट्स और ड्राई फ्रूट्स यानी सूखे मेवे को शामिल करना होगा.

बदलते समय के कारण इसके अलावा स्वास्थ्य के लिए कुछ चीजों को ‘ना’ कहना भी जरूरी है. जैसे- मैदा और उससे बनी चीजें (समोसा, मोमोज), जंक फूड और कुरकुरे, चीनी युक्त शीतल पेय और सोडा, बिस्कुट और नमकीन खाने से परहेज करना होगा.

30 साल की उम्र के बाद साल में एक बार ब्लड टेस्ट जरूरी

हिमाचल के हर व्यक्ति को, विशेषकर महिलाओं को, 30 साल की उम्र के बाद साल में कम से कम एक बार अपना ब्लड शुगर टेस्ट जरूर करवाना चाहिए. याद रखें, यह ‘महा-बीमारी’ चुपके से हमला करती है. समय पर पहचान और सही खान-पान ही आपको और आपके परिवार को इस खतरे से बचा सकता है.

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