Friday, February 20, 2026
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हिमाचल काे केंद्र से मिली वित्तीय सहायता, इन शर्तों के साथ जारी किए ₹286.83 करोड़

ऑनलाइन न्यूज नेटवर्क (ONN)

आर्थिक दबाव, राजकोषीय चुनौतियों और प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहे पहाड़ी राज्य हिमाचल को केंद्र सरकार से करीब 286.23 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता मिली है। यह राशि स्पैशल असिस्टैंट टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वैस्टमैंट योजना के तहत 2 हिस्सों में जारी की गई है। केंद्र सरकार ने योजना के पार्ट-3 के तहत 2722.992 लाख रुपए (करीब 27.23 करोड़ रुपए) की दूसरी किस्त जारी की है। यह राशि राज्य की पूंजीगत परियोजनाओं जैसे सड़क, पुल, भवन और अन्य आधारभूत ढांचे को गति देने के लिए निर्धारित की गई है। वहीं स्पैशल असिस्टैंस टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वैस्टमैंट के अंतर्गत 25900 लाख रुपए (259 करोड़ रुपए) की अतिरिक्त सहायता स्वीकृत की गई है। यह राशि विशेष रूप से प्राकृतिक आपदा से प्रभावित क्षेत्रों में अधोसंरचना के पुनर्निर्माण और मजबूती के लिए दी गई है।

10 दिन में संबंधित एजैंसियों काे ट्रांसफर करनी हाेगी राशि

देखा जाए तो केंद्र से मिली यह आर्थिक राहत हिमाचल के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन यह राहत पूरी तरह शर्तों की जंजीर में जकड़ी हुई है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि जारी धनराशि 10 कार्य दिवसों के भीतर संबंधित एजैंसियों को हस्तांतरित करनी होगी। 31 मार्च 2026 तक पूरा व्यय अनिवार्य होगा, अन्यथा राशि वापसी या समायोजन का सामना करना पड़ सकता है। बिना वास्तविक भुगतान के राशि को खाते में रोक कर रखना मान्य खर्च नहीं माना जाएगा। ऐसे में अब नजर इस बात पर रहेगी कि राज्य सरकार इस धनराशि को विकास की रफ्तार में बदल पाती है या सख्त नियमों के जाल में उलझ जाती है। समयबद्ध खर्च, पारदर्शिता और नियमों का पालन, इन तीनों कसौटियों पर खरा उतरना अब सरकार के लिए अनिवार्य होगा।

परियोजना में बदलाव से पहले स्वीकृति जरूरी

किसी भी परियोजना में बदलाव के लिए केंद्र की पूर्व स्वीकृति जरूरी होगी। दोहरी फंडिंग पाए जाने पर भविष्य में मिलने वाली केंद्रीय कर हिस्सेदारी से कटौती की जाएगी। समय पर उपयोगिता प्रमाण पत्र न देने पर अगली किस्त रोकी जा सकती है। इसी तरह कई अन्य शर्तें भी लगाई गई हैं।

आरडीजी बंद होने से लगा बड़ा वित्तीय झटका

राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद होने से हिमाचल प्रदेश को बड़ा वित्तीय झटका लगा है। इस अनुदान से राज्य के राजस्व और व्यय के बीच का अंतर पूरा किया जाता था। अब कर्मचारियों के वेतन, पैंशन और कल्याणकारी योजनाओं पर दबाव बढ़ सकता है। विकास कार्यों की गति भी धीमी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। राज्य को अधिक कर्ज लेने की नौबत भी आ सकती है। ऐसे में सरकार के सामने वित्तीय संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है।

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